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संसद से पास हुआ नया आपदा प्रबंधन कानून, क्या हुए बदलाव और क्या है मुआवजे का प्रावधान, जानें सबकुछ

बजट सत्र 4 अप्रैल को समाप्त हो रहा है. इस सत्र के समाप्त होने से पहले ही केंद्र सरकार ने एक ऐसे विधेयक को संसद से पारित करा लिया है, जो हर किसी की जिंदगी से जुड़ा हुआ है. ये समस्या बीमारी, महंगाई, बेरोजगारी से नहीं बल्कि प्राकृतिक आपदाओं की है. जिसकी वजह से पिछले साल देश भर में कम से कम 3 हजार लोगों की जान चली गई. साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा घर या फिर झोपड़े तबाह हो गए. 62 हजार के लगभग मवेशी लापता हो गए. जलवायु परिवर्तन की वजह से हर घड़ी प्राकृतिक आपदा की चिंताओं से घिरे भारत की मजबूत तैयारी के लिए केंद्र सरकार संसद में आपदा प्रबंधन संशोधन विधेयक लेकर आई, जो पिछले साल दिसंबर ही में लोकसभा से पारित हो गया था. और अब कल शाम (25 मार्च) राज्यसभा में इस विधेयक पर ध्वनि मत से मुहर लग गई.

 

ये सबकुछ संसद में ऐसे समय में हुआ जब विपक्ष आपदा राहत से जुड़े प्रयासों में राजनीतिक पक्षपात के आरोप केंद्र की मोदी सरकार पर मढ़ता रहा. अब आपदा प्रबंधन संशोधन विधेयक 2024, जो संसद से पारित हो चुका है, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा. नए कानून ने 2005 के आपदा प्रबंधन कानून में संशोधन कर एनडीएमए (नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी – राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) और एसडीएमए (स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी – राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) को और सशक्त किया है. साथ ही, जिले के स्तर पर भी डिजास्टर मैनेजमेंट इकाई बनाने का प्रावधान किया है. जिससे वे समय रहते आपदा से निपटने की योजना बना सकते हैं. साथ ही, एनडीआरफ की तरह ही एसडीआरएफ को भी हर राज्य में तैनात करने का प्रावधान किया गया है.

नए कानून की बड़ी बातें

सरकार इस विधेयक को 1 अगस्त 2024 को ही लेकर आई थी मगर इसे पारित होने में तकरीबन आठ महीने लग गए. 2004 की भयंकर सुनामी, 2001 के गुजरात के भुज के भूकंप और साल 1999 के ओडिशा के सुपर साइक्लोन के बाद साल 2005 में केंद्र सरकार आपदा प्रबंधन कानून लेकर आई थी. जिसमें ताजा संशोधन मोदी सरकार ने किया है. भारत में आपदाओं के प्रबंधन और उससे संबंधित शासन के लिए लाया गया ये प्रावधान काफी अहम है. इस कानून के लागू होने के बाद राष्ट्रीय, राज्य और यहां तक की जिले के स्तर पर न सिर्फ आपदा प्रबंधन ऑथोरिटी बल्कि आपदा प्रबधंन योजना की स्थापना होगी. नए कानून की सबसे अहम बात एनडीआरएफ – नेशनल डिजास्टस रिस्पॉंस फोर्स का गठन है.

 

ये एक ऐसी एजेंसी है जिसने पिछले कुछ बरसों के आपदाओं के समय मुश्किल परिस्थितियों और कठिन भूभाग में अपने काम से तारीफें बंटोरा है. सरकार का दावा है कि 2005 के कानून में संशोधन राज्यों की तरफ से पेश आ रही परेशानी और उनके कुछ सुझाओं के आधार पर लिया गया है. आपदाओं से निपटने के लिए राज्य के स्तर पर स्टेट डिजास्टर रिस्पोंस फोर्स फिलहाल ओडिशा और गुजरात जैसे कुछ राज्यों ही में है. अब नए कानून के बाद सरकार इसी तरह की टीम दूसरे राज्यों में लागू करने की तैयारी में है. दिल्ली और चंडीगढ़ के अलावा दूसरे राज्यों की राजधानियों और नगर निगम वाले शहरों में अर्बन डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी स्थापित करने की भी व्यवस्था इस कानून में की गई है.

विपक्ष की आपत्तियां क्या हैं?

कहा जा रहा है कि इस कानून से राष्ट्रीय और राज्य स्तर के आपादा प्रबंधन इकाइयों के काम करने में क्षमता बेहतर होगी. मगर विपक्ष की इसे लेकर कई आपत्तियां भी हैं. राज्यसभा में विपक्षी नेताओं ने कई तरह के संशोधन सुझाए मगर सभी सुझाओं को बहुमत की संख्या से खारिज कर दिया गया. केंद्र सरकार का कहना है कि नए कानून से आपदा प्रबंधन के लिए काम कर रहे देश भर के संगठनों की भूमिका और जिम्मेदारी नए सिरे से तय होगी और वे अब ज्यादा बेहतर समन्वय और एकरुपता के साथ आपदाओं से निपट सकेंगे. विपक्षी पार्टियां राज्य की ताकत छीनकर उसे केंद्र को देने की कोशिश बताती रही. जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी क्योंकि जिला आपदा प्रबंधन ऑथोरिटी के पास होगी, अंततः राज्य सरकार ही की भूमिका अहम रहने वाली है.

सिर्फ राज्यसभा ही से नहीं बल्कि लोकसभा में जब ध्वनि मत से बिल पारित हुआ था, तब भी विपक्ष की तरफ से विधेयक में सुझाए गए कई संशोधनों को दरकिनार कर दिया गया था. विपक्ष की आपत्तियां हैं कि नए संशोधनों के बाद केवल बड़े पैमाने पर संगठन बन जाएंगे लेकिन ठोस कुछ करने की व्यवस्था नहीं की गई है. कांग्रेस के लोकसभा सांसद जीके पाडवी ने पिछले साल दिसंबर में काफी गंभीर सवाल उठाया था. पाडवी का कहना था कि इस विधेयक में जलवायु परिवर्तन का कहीं भी जिक्र नहीं है. साथ ही, ‘मुआवजे’ की जगह वए कानून में ‘राहत’ लिख दिया गया है, जो लोगों के लिए सही नहीं है. ताकत के केंद्रीकरण से भी विपक्ष को आपत्तियां थीं. विपक्ष की तब की आपत्तियों पर लोकसभा सांसद अरुण गोविल ने तंज करते हुए कहा था कि संसद में होने वाला गतिरोध भी एक तरह का मानव-निर्मित आपदा है. इसका भी स्थायी समाधान करना चाहिए.

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